हमारी सोच हमारी भूल
हम सोचते हैं कि हम जो सोचते हैं जो कहते हैं, जो सुनते हैं और जो करते हैं, वही सही है, उसे कोई नहीं देखता है ऐसा सोचना हमारी
बड़ी भारी भूल है। हमें जन्म देने, पालन करने तथा मारने वाली भी एक महान अदृश्य शक्ति है जिसे हम सभी ईश्वर,
अल्लाह, गॉड आदि नामों से याद करते हैं अथवा महसूस करते हैं। वही शक्ति हमारे कार्यों को देखती है, सुनती है और उन्हीं के आधार पर हमें
उनका फल देती रहती है। वास्तव में हम सभी कुछ उसकी इच्छानुसार ही करते हैं इसमें इसमें लेशमात्र भी संदेह
नहीं है। हम तो इस संसार में जन्म लेते हैं और पूर्व कर्मों के फलानुसार कार्य कर तथा
अपने विवेकानुसार कार्यों को करके फल दुख एवं सुख को भोग कर मृत्यु लोक को चले
जाते हैं। हम अपनी थोड़ी सी शक्ति, ज्ञान एवं धन जो वास्तव में उसी शक्ति (ईश्वर) की
कृपा से प्राप्त करते हैं पर गर्व करने लगते हैं गर्व बढ़ने पर हम विवेकहीन होकर
अपनी प्राप्त हुई शक्ति, ज्ञान एवं धन को खोकर स्वयं समाप्त कर बैठते हैं।
मनुष्य नाशवान है अतः उसका ज्ञान, धन, शक्ति भी नाशवान है
युगो युगो से इतिहास हमें यही बताता है कि जीव संसार में जन्म लेता है और अपने
अच्छे-बुरे कर्मों को कर व उनका फल भोग कर नष्ट हो जाता है। यदि रह
जाती है तो केवल वह शक्ति (दैविक) जो अजर है, अमर है जो इस कालचक्र को युगो-युगो
से चलाती आ रही है और आगे भी चलाती रहेगी। अतः हमारी यह सोच कि हम सब कुछ हैं, सब कुछ अपनी इच्छा से
कर सकते हैं भोग सकते हैं हमारी बहुत बड़ी भूल है।

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